Thursday, March 2, 2017

परों को खोल

परों को खोल कि ये आसमान तेरा है,
लाबों से बोल कि अब इमतिहान तेरा है .




चलो कुछ काम करते है ..
अाज का पत्थर उनके नाम करते है .
है जिनकी रूसवायी ज़िन्दगी से .
जो मौत को बांटे यहाँ खुशदिली से .
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.इंसा है तो हुआ करे कोई ,
वक्त् की भी सदा सुने कोई ,
वो जो हो गये फना वतन के लिये ,
उनकी खातिर भी दुआ करे कोई 
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यथार्थ से परे हुये ,
द्वंद से भरे हुये ,
शब्द जो कि मौन हैं ,
किसको कहें कौंन हैं ,
राह जोहता खुशी की ,
चाह खोजता खुशी की ,
समय के अभाव में ,
ज़िन्दगी की चाह में ,
हाथ जोड़ता खुशी की
कब दिन गुजर गया ,
रात है कि थम गयी सी ,
सुबह की तलाश में ,
यथार्थ से परे हुये
द्वंद से भरे हुये ,
ख्वाब बुन रहे सभी ....
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श्मशान और कबरिस्तान तो पहले से ही बनादिये सबने ...
अबके कुछ और बनाओं ..कुछ ओर आगे तक जाओं ..
कुछ नया लाओँ ..मन की बात छोडो ....दिल की बात सुनों ...
वक्त क्या चाहता है वक्त क्या मांगता है वह देखो....
हो गयी बहुत बाते ...अबके कुछ काम करो ..
ज़िन्दगी को जोडो ज़िन्दगी से ..
तोड़ने की ....ना बात करो .....
श्मशान ओर कब्रिस्ता तो याथार्थ हैं ..
अभी तो कुछ ख्वाब की बात करो ..
कुछ ख्वाबो में रंग भरो ..
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हवायें थम गयीं कैसे 
दुआयें कम हुयी कैसे 
लाल के दरबार में 
मौहब्बत कम हुयी कैसे ..
नजर डालो जहां तक 
हर तरफ रांगदारी हैं
सुर्खरू अबके
फिजायें हो गयी कैसे
लाली काहे लाल की
फैल गयी चहु ओर
एेसो रंग ना दीजो लाल
अबके ना कींहों मोहे लाल